Monday, 9 February 2015

आशा ...


मैंने
खुद अपनी
आँखों से
 देखा है ...
धरती कभी
रोती नहीं
रोता है केवल आकाश ;
जिसके आँसुओं की धार
धरा की दरारों को
पाट देती है...!
वह तो
 सिर्फ
आकाश के आँसू को
 अपने आँचल में
 समेट कर
झील में
खिले कमल
तरह मुस्कुराते रहती है....।
तुम भी
 मुस्कुराओ
उदासी त्याग ;
कल सूरज के
आते ही
तुम्हारा बदन
कमल हो जाएगा।।।।

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