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Sunday, 24 May 2015

भीषण अगन है।।



जलाता पवन है।
भीषण अगन है।।
 
मौसम का कहर।
सुबह हुआ दोपहर।।

शाम लगी आग।
नींद गयी भाग।।

छाया कहीं न।
जिश्म बे पसीना।।

चढ़ गया पारा।
लुप्त जल धारा।।

विकास की कहानी।
प्रलय की निशानी।।
 ---------@sriramroy

Thursday, 6 June 2013

वर्षा रानी आगई ....


वह आया /  
अपने संग ...
उसे भी ...
 लाया । 
अपने विशाल ,
बाजुओं में समेटे ...
आसमान से चौड़े ..
 सीने से लपेटे । 
जिसके लिए /
धरती थी/
 बेचैन ..../
दुनिया ../
हो रही  थी  ... बेकाबू ।
 जितनी थी ...
बाहर /
उतनी थी ..
अन्दर /
गर्म हवा ;
गर्म साँसे , 
गर्म दीवारे ..
और ना जाने ...
क्या -क्या !!
सबको /
वह मचलती /
अटखेली करती/ 
हवा संग ...
मतवाला बादल .....
करते पानी -पानी /
लेआया वर्षा रानी ...॥ ---- श्री राम रॉय 

Monday, 27 May 2013

हाँ -हाँ तू गर्मी है $$$$


अदना सी , 
वह ..
नापसंद है । 
दिन भर;
जलाती है ,
रात को ...
तड़पाती है ।
 बदन से ...
 लिपटी हुई ....
दोपहरिया को भी ,
कमरे में ,
बंद है । 
चेहरे पे छाई ...
उदासी है ;
 घर -बाहर ,
प्यासी है । 
जाने कहाँ ,
प्यास बुझाएगी तू ...
दरिया -तालाब सुखाकर ,
भरी महफ़िल में ,
कुर्ता -पाजामा खुलवाकर । 
हाय !तू बेशर्मी है ....
हाँ -हाँ तू गर्मी है ॥ ----श्री राम रॉय 
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