Sunday, 24 May 2015

भीषण अगन है।।



जलाता पवन है।
भीषण अगन है।।
 
मौसम का कहर।
सुबह हुआ दोपहर।।

शाम लगी आग।
नींद गयी भाग।।

छाया कहीं न।
जिश्म बे पसीना।।

चढ़ गया पारा।
लुप्त जल धारा।।

विकास की कहानी।
प्रलय की निशानी।।
 ---------@sriramroy

Wednesday, 20 May 2015

!!जीवन सार!!

बस कर
मत डर। 

पहर दोपहर
मिले जहर।

बुलंद हौसले
पत्थर मसले। 
चल बेखबर
लम्बी उमर।
दुनिया निराली
सुख की प्याली।

जीभर जीना
कभी न रोना। 

जीवन सार
जीत हार।

--श्रीराम

Friday, 15 May 2015

अकेलापन


छाई मस्ती 
  हुई दोस्ती। 

तोड़े बाँटे 
  छोटे काँटे। 

रोती रात 
   ख़त्म बात। 

हुई भूल 
    दिया फूल। 

 एक किताब 
      एक गुलाब।   
      ***
 Sriram Roy 
      *** 

Saturday, 9 May 2015

ज़ी बहुत सुन्दर है।।

जमीं आकाश के नीचे बेघर है।
ज़िन्दगी मौत से भी बद्तर है।।


दिल दरिया समंदर का पानी
दो पल की  ख़ुशी गमे सागर है।।


महबूब का हर पल क़यामत का
यूँ कहे जिन्दगी आशिके जहर है।।


जिन्दगी कड़ी धुप है चौराहे पर
जिन्दगी फूल काँटो के अंदर है।।


जिन्दगी बेहोश न जोश में अगर
जिन्दगी जिन्दगी है बहुत सुन्दर है।।
      -----श्री राम

Sunday, 19 April 2015

करवटें बदलते ही....


रौशनी चिराग का ,कम जो हो गया।
जाग गये हम और, ज़माना सो गया।।

टिमटिमाती लौ जिसकी ,रात भर रही
जलाता रहा उसे ,उसके पास जो गया।।

एक रेशमी किरण ,इस तरह से आई
टूट गये सपने ,कि दिन हो गया।।

बंद आँखों में, हमसफ़र साथ था
करवटें बदलते ही ,कहाँ वो खो गया।।

रौशनी चिराग का कम जो हो गया।
जाग गये हम और ज़माना सो गया।।
                                                     -------Sriram Roy

Monday, 13 April 2015

अन्न -दाता ……।

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कुदरत की मार से ;
खेत -खलिहान है  I 
कौन बचायेगा इन्हें ;
 मर रहा  किसान है II 

ओले नही गोले गिरे ;
खेतो के सीने में I 
अब क्या रखा है  ;
 भूखे पेट जीने में II 

मिटटी  के लाल ही ;
मिट्टी में मिल रहे  l 
फूल बोया खेत में ;
काँटे हैं खिल रहे  l 

लहूलुहान जिस्म है;
 चिलचिलाती धूप में  l 
डाल रहा डोल है ;
सूखे पड़े कूप में  ll 

अन्न- दाता  बना भिखारी ;
दाने-दाने को मोहताज हैl 
हे"राम "तेरे जग में;
 कैसा यह रिवाज है    ll         

Friday, 27 March 2015

पिया के पत्र(मिथिला भाषा)


धीरज धरु हम आबै छि I
 अप्पन पता बताबै छि II
धीरज धरु हम आबै छि.........

 चैत मास बीतत कोना जल्दी,
 मोन करै झट सँ चैलदी। 
भुलब जुनी आँहाँ हमरा ;
गीत अहीं के गाबै छिII
 धीरज धरु हम आबै छि.......

बिन नोकरी पेटो नै भरतै ,
भागब त बौआ कोनापढ़तै ।
रुसब नै आँहा कनियो ;
सच बात सुनाबै छिII 
 धीरज धरु हम आबै छि.……

खूब प्रेम से पाति लिखू,
दूर गगन में हमरा देखू।
अहीं के गहना किनय ले ;
पैसा खूब बचाबै छि II
धीरज धरु हम आबै छि........II

                                 --------------Sriram Roy

Saturday, 21 March 2015

तुम्हारे यादों जैसी.....


मेरी
डायरी के
पन्नों बीच
बरसों पड़े
गुलाब की
पंखुड़ियाँ
ज्यों की त्यों हैं
तुम्हारे यादों जैसी।
 उसका रंग भी
 वही गुलाबी है
जिसतरह
चिकने तुम्हारे
होंठ थे
तुम्हारी
झील सी
आँखों के आगे
चैत की
मस्त बयार में
किये वादों जैसी।
परन्तु
इसकी खुशबू
किसी
 पतंगे के
 इन्तजार में
पुरानी पड़ गयी है ।।।

Saturday, 21 February 2015

नयी जिन्दगी का अहसास...

(नमस्कार!!आप विद्वान मेरी कविता को गहराई से पढ़ें और अपना बहुमूल्य मार्गदर्शन देने की कृपा करें--आपका श्रीराम)

नन्हा सूरज दिखता जब;
  पल ख़ास होता है।
हर सुबह नयी जिन्दगी का;
   एहसास होता है।।

भींगे ओस से निर्मल;
दुनिया जाग जातीहै ।
 मुस्कती मस्तानी हवा;
शैर को बाग आती है।
नव किरणों के आने से;
रंगीन आकाश होता है।।

शांत सरोवर का तट;
कली कमल के फूले।
मन में नाचे मोर ऐसे;
जैसे सावन में झूले ।
पंछी के झंकृत कोलाहल;
काम क्रोध भी नाश होता है।।

दोपहर की धूप में;
छाया बन छा सकता ।
जीवन हंस सुबह में;
जीवन मोती पा सकता।
जीवन साजन सजकर;
सजनी के पास होता है।।
      ----श्रीराम

Monday, 9 February 2015

आशा ...


मैंने
खुद अपनी
आँखों से
 देखा है ...
धरती कभी
रोती नहीं
रोता है केवल आकाश ;
जिसके आँसुओं की धार
धरा की दरारों को
पाट देती है...!
वह तो
 सिर्फ
आकाश के आँसू को
 अपने आँचल में
 समेट कर
झील में
खिले कमल
तरह मुस्कुराते रहती है....।
तुम भी
 मुस्कुराओ
उदासी त्याग ;
कल सूरज के
आते ही
तुम्हारा बदन
कमल हो जाएगा।।।।

Thursday, 5 February 2015

कागज़ कलम -कलम !!


कलम होता रहे कलम ही अगर ।

खून से भींग जाएगा सारा शहर।।

इस दिल को ही कागज़ कहिये
 जिसपे चलते रहे हैं सदा खंजर ।।
जवानी गजल है मदहोश प्यार का 
कागज है कुवारी कलम हमसफ़र ।।
इश्क छीनो नहीं किसी महबूब का 
कर लेने दो उसको सुहाना सफ़र।।
गजल की अगर कोई उड़ाए हँसी 
टुकड़ा टुकड़ा हो जाएगा मेरा जिगर।।
                             ssss--श्रीराम 

Monday, 2 February 2015

आया बसंत-----!


प्रथम किरण  से  खिले
 प्रथम कमल का पुष्प लिये
 प्रथम धार के
प्रथम वेग को
प्रथम अधरों से चूमता
 प्रथम प्रथम आता
प्रथम वीणा के झंकार से
प्रथम पहर गाता संत
प्रथम प्रथम आता बसंत ।।

उमंगों की धरा
रंगीन हंसी नजारा
बेल बसंत से
लिपटी हुई
कोयलिया की कु कु को
आम मंजरियों से देख खेलते
कुछ कहते न बनते !
तुम जो आये बसंते!!!
------श्रीराम

Saturday, 15 November 2014

झलक जीवन की

 ( झलक जीवन की)
 ***************
 गया उड़ पंछी पिंजड़ा छोड़ ,
  जाने किधर को पता नही । 
  मैंने हर-पल मना किया था। 
 किसी जान को सता नहीं ॥ 

राम नाम की रट छूटी ;
छूट पड़े नयनों से पानी  ।
 एक दिन उड़ना प्राण पखेड़ु ,
कैसे माने मन अज्ञानी ॥ 

देख-देख सुने पिंजड़े को ,
विह्वल मन से कैद हुऐ । 
यादों की तब दौर चली ;
संगी-साथी वैद्य हुये ॥ 

बड़े जतन से पाला-पोसा ;
होगा  दूध पिला कर कोई । 
देख चहकते सुबह -शाम ;
अलविदा कह गया कोई ॥ 

जीवन पंछी गुंटूर-गुंटूर ;
ना जाने कब उड़ जाएगा । 
रख प्यार से इसको ;
जाएगा फिर ना आएगा॥ 
----श्रीराम रॉय (झलक जीवन की )

Friday, 3 October 2014

चाँद जमीं पर उतरे ,आये ऐसी रात रे.....



 मिलन का पंछी उड़ - उड़ गाये ,सुने मन की  बात रे। 
जाने किस घड़ी होगी ,चन्दा से मुलाक़ात रे********
सुबह का सूरज नींद उड़ाकर ,सपनों का संसार चुराया।
बागों में बैठ कर गर्मी ने ,हँसते फूलों को मुर्झाया। 
कलियाँ पूँछ रही रह -रह,कब होगी बरसात रे*******
देख चाँद को नीलगगन में ,नन्हा सा बादल गायेगा। 
आँख-मिचौनी खेल देख कर ,पागल दिल हो जाएगा। 
चाँद जमीं पर उतरे ,आये ऐसी रात रे ************
प्यारी -प्यारी मीठी बातों में ,दिल के दाग धुल जायेंगे।
 चाँद -सितारे होंगे बहाने ,फूल प्यार के मिल जाएंगे। 
प्रिये दूर रहे और पास दिखे ,होती दिल से बात रे*****

Tuesday, 16 September 2014

व्यंग ..........

रिश्वत ___
***********
शिक्षक  ने ,
विद्यादान से पहले ,
छात्र से अनुदान लिया ;
विश्वविद्यालय विकास के लिये। ।
भ्र्ष्टाचार नाश के लिये।।

रिश्ता --
***********
छात्र
शिक्षक की
इज्जत करता है।
पैर छूने से पहले ,
हाथ मिलाता है।  ।

Sunday, 7 September 2014

रोटी कुत्ते खायेंगे-- तुम चावल फाँक लो----

रोटी कुत्ते खायेंगे ....... तुम चावल फाँक लो----
आखिर कोई क्यों --
भीख में --
दो मुट्ठी-
 चावल देता है ;
जिसके हाथ -
पहले से ही -
जल कर ठूँठ हो गये हैं --;
और जिनकी आँखे ---
भूख जलाते -जलाते--
 अन्धी हो गयी ।
शाम ढलने से पहले ही ---
उसकी भूख सो गयी ---
रात के अँधेरे में ;
भूख खो गयी ---
दाँतो से ,
चवाल के दाने चवाते हुए -----;
एक रोटी माँगते हुए-------;
 उसे किसीने --
डाँट दिया था ;
कतरे -कतरे को बाँट दिया था--
कि ----
"रोटी "
कुत्ते खायेंगे .......
"तुम चावल फाँक लो----।"
---------------श्रीराम रॉय 08 -09-14
                            -----------------

Wednesday, 27 August 2014

कली मत तोड़ो ******



कली मत तोड़ो --।
खिलने दो फूल --
जब झड़  जायेँगे ;
तब चुन लेना ।
अपने बाग़ में,
 उसके बीज बो देना ।
पहले पौधे उगेंगे :
फिर कली होगी फूल ;
जिसके चारोँ ओर ,
भँवरे गुँजन करेंगे ।
सुंगधित हवा बहेगी ।
तुम वहीँ बैठ जाना --
पलभर के लिए चैन से।
कली मत तोड़ो ;
देखो केवल नैन से ……।।
________Sriram Roy

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