Sunday, 26 July 2015

घटा के संग

Sunday, 24 May 2015

भीषण अगन है।।



जलाता पवन है।
भीषण अगन है।।
 
मौसम का कहर।
सुबह हुआ दोपहर।।

शाम लगी आग।
नींद गयी भाग।।

छाया कहीं न।
जिश्म बे पसीना।।

चढ़ गया पारा।
लुप्त जल धारा।।

विकास की कहानी।
प्रलय की निशानी।।
 ---------@sriramroy

Wednesday, 20 May 2015

!!जीवन सार!!

बस कर
मत डर। 

पहर दोपहर
मिले जहर।

बुलंद हौसले
पत्थर मसले। 
चल बेखबर
लम्बी उमर।
दुनिया निराली
सुख की प्याली।

जीभर जीना
कभी न रोना। 

जीवन सार
जीत हार।

--श्रीराम

Friday, 15 May 2015

अकेलापन


छाई मस्ती 
  हुई दोस्ती। 

तोड़े बाँटे 
  छोटे काँटे। 

रोती रात 
   ख़त्म बात। 

हुई भूल 
    दिया फूल। 

 एक किताब 
      एक गुलाब।   
      ***
 Sriram Roy 
      *** 

Saturday, 9 May 2015

ज़ी बहुत सुन्दर है।।

जमीं आकाश के नीचे बेघर है।
ज़िन्दगी मौत से भी बद्तर है।।


दिल दरिया समंदर का पानी
दो पल की  ख़ुशी गमे सागर है।।


महबूब का हर पल क़यामत का
यूँ कहे जिन्दगी आशिके जहर है।।


जिन्दगी कड़ी धुप है चौराहे पर
जिन्दगी फूल काँटो के अंदर है।।


जिन्दगी बेहोश न जोश में अगर
जिन्दगी जिन्दगी है बहुत सुन्दर है।।
      -----श्री राम

Sunday, 19 April 2015

करवटें बदलते ही....


रौशनी चिराग का ,कम जो हो गया।
जाग गये हम और, ज़माना सो गया।।

टिमटिमाती लौ जिसकी ,रात भर रही
जलाता रहा उसे ,उसके पास जो गया।।

एक रेशमी किरण ,इस तरह से आई
टूट गये सपने ,कि दिन हो गया।।

बंद आँखों में, हमसफ़र साथ था
करवटें बदलते ही ,कहाँ वो खो गया।।

रौशनी चिराग का कम जो हो गया।
जाग गये हम और ज़माना सो गया।।
                                                     -------Sriram Roy

Monday, 13 April 2015

अन्न -दाता ……।

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कुदरत की मार से ;
खेत -खलिहान है  I 
कौन बचायेगा इन्हें ;
 मर रहा  किसान है II 

ओले नही गोले गिरे ;
खेतो के सीने में I 
अब क्या रखा है  ;
 भूखे पेट जीने में II 

मिटटी  के लाल ही ;
मिट्टी में मिल रहे  l 
फूल बोया खेत में ;
काँटे हैं खिल रहे  l 

लहूलुहान जिस्म है;
 चिलचिलाती धूप में  l 
डाल रहा डोल है ;
सूखे पड़े कूप में  ll 

अन्न- दाता  बना भिखारी ;
दाने-दाने को मोहताज हैl 
हे"राम "तेरे जग में;
 कैसा यह रिवाज है    ll         

Friday, 27 March 2015

पिया के पत्र(मिथिला भाषा)


धीरज धरु हम आबै छि I
 अप्पन पता बताबै छि II
धीरज धरु हम आबै छि.........

 चैत मास बीतत कोना जल्दी,
 मोन करै झट सँ चैलदी। 
भुलब जुनी आँहाँ हमरा ;
गीत अहीं के गाबै छिII
 धीरज धरु हम आबै छि.......

बिन नोकरी पेटो नै भरतै ,
भागब त बौआ कोनापढ़तै ।
रुसब नै आँहा कनियो ;
सच बात सुनाबै छिII 
 धीरज धरु हम आबै छि.……

खूब प्रेम से पाति लिखू,
दूर गगन में हमरा देखू।
अहीं के गहना किनय ले ;
पैसा खूब बचाबै छि II
धीरज धरु हम आबै छि........II

                                 --------------Sriram Roy

Saturday, 21 March 2015

तुम्हारे यादों जैसी.....


मेरी
डायरी के
पन्नों बीच
बरसों पड़े
गुलाब की
पंखुड़ियाँ
ज्यों की त्यों हैं
तुम्हारे यादों जैसी।
 उसका रंग भी
 वही गुलाबी है
जिसतरह
चिकने तुम्हारे
होंठ थे
तुम्हारी
झील सी
आँखों के आगे
चैत की
मस्त बयार में
किये वादों जैसी।
परन्तु
इसकी खुशबू
किसी
 पतंगे के
 इन्तजार में
पुरानी पड़ गयी है ।।।

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